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हमने स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता लगाया है- भय्यूजी महाराज

तारीख : January 26, 2016 कुल देखें : 386

गणतंत्र दिवस पर विशेष

हमने स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता लगाया है- भय्यूजी महाराज



हम स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक है जब से हमारा संविधान लागू हुआ हम अपने राष्ट्र में अपनी कानून व्यवस्था के साथ जी रहे है। पर क्या सचमुच हम अपने राष्ट्र में भयरहित जी रहे है। इस पर जब विचार करते है तो अनेक समस्याओं की और हमारा ध्यान जाता है।  जो की सूरसा की तरह हमारे सामने होती है फिर वह बेरोजगारी की समस्या हो महंगाई की समस्या हो या भ्रष्टाचार की समस्याएं हो। हमने विकास के नाम पर अनेक भौतिक सुख सुविधाएं तो प्राप्त कर ली पर आत्म अवलोकन करें तो कहीं ना कहीं स्वयं को पतन की और जाते हुए देखते है। उसका कारण है कि देश के प्रति स्वाभिमान, प्रेम हमारे ह्रदय में नहीं है। 

हमने स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता लगाया है। हम कितना अपने पडोसी का ध्यान रखते है। हम कितना अपने परिवार के सदस्यों के प्रति समर्पित है। हम अपने परिवार के प्रति समाज के प्रति समर्पित नहीं है तो देश के प्रति क्या होंगे। हमने सोचा है रोजमर्रा की जिंदगी में हम राष्ट्र की संपत्ति का कितना ध्यान रखते है। नागरिकों के हितों की रक्षा का अनुशासन का कितना ध्यान रखते है। इन सब प्रश्नों के उत्तर देते समय हम समझ जायेंगे कि हम देश के प्रति कितने कर्तव्यशील है। आज़ाद देश की नागरिकता में हम वाकई पिछड़े है। 

हम चाहते है कि हमारे देश में भगतसिंह तो जन्म ले पर हमारे घर में नहीं पडोसी के घर में। हमारी अपनी मर्यादा अपनी देश सेवा अपने स्वार्थ शैली के चलते धराशाही हो जाती है। हम केवल देखते रहते है। जहाँ नियम में रहने की बात आती है हम नियम तोड़ते है। हमारा अपना एक लोकतंत्र है हम उसका कितना आदर करते है। व्यवस्था के नाम पर हम सबसे पहले व्यवस्था और नियमों से बचने के उपाय ढूंढते है। 

राष्ट्रगान का हम कितना सम्मान करते है। राष्ट्रगान गाते समय हम में से कितने व्यक्ति ऐसे हे जो सचमुच उसका सम्मान करते है। राष्ट्र के दायित्वों को राष्ट्र की संपत्ति समझकर उसका अनुसरण करना चाहिए। देश में आज एकात्मकता के नाम पर हम सिर्फ छोटे छोटे अपने समाज और भाषाई विवाद को लेकर खड़े हो जाते है। कही जाती के नाम पर हम संघर्ष शुरू कर देते है तो कही धर्म के नाम पर साधारण सी ट्राफिक व्यवस्था को भी हम अपने जुलूस जलसे के लिए ताक पर रख देते है। 

संतो को सूफियों को हमने जातिवाद में बाँट दिया। जितना विशाल धरातल उनका था उसे हमने समाज और जाति की चौखट में बांधकर संकुचित कर दिया है। हमारी राष्ट्रीय भावनाओं और प्रेम का प्रमाण हमारे सामने यह है अधिक से अधिक राष्ट्रीय उद्द्योग या तो ख़त्म हो गए है या खत्म होने की कगार पर है। स्वदेश में सब कुछ मिलने पर भी हम बहार की वस्तुओं का मोह नहीं छोड़ते। इसका कारण यही है कि हम राष्ट्रीय सम्पत्ति को कम महत्व देते है। राष्ट्र की संपत्ति को चुराकर अपना घर भर लेते है। जो लोग अपना घर भरने के लिए देश और समाज का अहित करने में नहीं चूकते ऐसे लोगों के खिलाफ कुछ बोलने का साहस कितने लोग जुटा पाते है। अन्याय करना अन्याय सहना अब हमारी आदत बन चुकी है। 

आज हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार, अनैतिकता और व्यभिचार बढ़ गया है। जो व्यवस्था संभालता है वह और जो व्यवस्था में आता है वह भी व्यवस्थाओं के बाहर जाकर सोचता है, देखता है। नैतिक मूल्यों को सिद्धांतो को सिर्फ किताबों में रखकर हम आगे बढ़ जाते है। आज़ादी के बाद भी गरीबी और गरीब बढ़ते ही जा रहे हैं। शिक्षा के नाम पर एक व्यक्ति पांच लाख अपने बच्चे के लिए दे सकता है तो एक व्यक्ति के पास पांच रूपये भी नहीं है। 

समाज में कितने ही लोग ऐसे है जिन्हे भर पेट अन्न तक नसीब नहीं है और सूखाग्रस्त किसानों का दुःख समझने के बाद भी शादी पार्टियों में अन्न की बर्बादी होती है। अन्न का सही वितरण हमारे यहाँ नहीं है। हमारी संवेदनाये धीरे-धीरे संकुचित होती जा रही है। कहीं ऐसा न हो कि देश समाज परिवार हमारे लिए एक कल्पना मात्र रह जाये इसके पहले हमें स्वयं को जगना होगा और जगाना होगा। यदि राष्ट्र का विकास चाहिए। सचमुच में लोकतंत्रात्मक राज्य चाहिए तो प्रत्येक को स्वयं को बदलना होगा। हम राष्ट्र के उन नियमों पर विचार करें जो हमें आदर्श नागरिकता के श्रेणी में रखते है। हम किसी का विरोध न करते हुए राष्ट्र के नीतिगत सिद्धांतों का पालन करे। राष्ट्रीय उद्योगों को स्वीकार करे यही इस गणतंत्र दिवस पर लिया गया सच्चा संकल्प होगा। 

तो आईये हम लोग मिलकर अपने देश को सफल लोकतंत्रात्मक गणराज्य से विभूषित करे जहाँ हर व्यक्ति स्वतंत्र भारत में स्वतंत्र श्वास भरते हुए भयरहित जीवन जिए। 


जयहिन्द जय भारत 

प. पू. सद्गुरु श्री भय्यूजी महाराज

प्रणेता

श्री सद्गुरु दत्त धार्मिक एवं पारमार्थिक ट्रस्ट इंदौर (म.प्र.)


 



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