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सनातन संस्कृति के सबसे बड़े पर्व सिंहस्थ से हिन्दू जागरण  – भय्यूजी महाराज 

तारीख : April 15, 2016 कुल देखें : 364

‘सनातन’ जिसकी उत्पत्ति से लेकर अन्त तक, कोई भाष्य या व्याख्या करना उतना ही सरल है, जिस प्रकार से अमरत्व को प्राप्त व्यक्तित्व की या स्वरुप की स्वीकरोक्ति अथवा उसका अस्तित्व | सनातन का अर्थ ही है, ‘नित्य नूतन इति सनातन’ अर्थात् जो प्राचीनतम होकर भी प्रति क्षण नया है, वही सनातन है | सनातन धर्म की सर्व समावेशी संस्कृति और इसका औदार्य, जो विभिन्न संस्कृतियों की धाराओं को स्वयं में एक महासागर समान समेटकर,     अपने स्वरुप को विशाल से, विशालतम करने की प्रक्रिया को, निरन्तर चलायमान रखता है, इसका यही गुण इसे महान, अद्भुत, अद्वितीय और शाश्वत बनता है | सनातन धर्म को वर्तमान में हिन्दू धर्म के नाम से भी जाना जाता है और इसी हिन्दू धर्म अथवा हिन्दुत्व की विचारधारा तथा हिन्दू संस्कृति, सनातन धर्म के उत्पन्न विचारों का एक प्रवाह है | एक ऐसा प्रवाह जो अध्यात्म से सीधा धर्म-संवाद साधने का और उस धर्म को आचरण के रूप में परिभाषित कर, मानवीय संवेदना, जिसे हम शाब्दिक रूप में ‘समाज’ कहते हैं, उसका सम्पूर्ण निर्माण करता है | 

हिन्दुत्व एक ऐसा दर्शन है, जहां राष्ट्र, समाज और मानवता का भाव ममता और वात्सल्य से निर्माण होता है, इसलिए हमारी संस्कृति मातृत्व की संस्कृति है और मातृत्व की संस्कृति होने के कारण प्रत्येक पवित्र स्थिति और अवस्था को चाहे राष्ट्र हो, चाहे समाज हो, चाहे मानवता हो, चाहे नदियां हों, चाहे वृक्ष हों या गुरु हों, हम सभी को मातृत्व भाव के रूप में सम्मान देते हैं | मातृत्व का जो सबसे प्रमुख गुण है वह है सहिष्णुता; इसलिए वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जहां सहिष्णुता और असहिष्णुता के विषय पर विवाद हो रहा हो, बहस छिड़ी हो और यह एक मुद्दा बना हो, ऐसे में असहिष्णुता का विचार रखने वालों को, हिन्दू संस्कृति का समग्र दर्शन करना चाहिए |

 मातृत्व का जो दूसरा प्रमुख गुण होता है वह है सम्मान और स्वाभिमान | एक चार वर्ष के अपने नन्हें बालक को मातृत्व, सम्मान और स्वाभिमान से स्वराज्य की कैसे स्थापना की जाती है ? यह राष्ट्रप्रेम, सम्मान और स्वाभिमान से ओत-प्रोत, मातृत्व सिखाता है, सिद्ध रूप में जीजा माता और छत्रपति शिवाजी महाराज इसका उदाहरण हैं | तीसरा, मातृत्व का जो श्रेष्ठतम बोध होता है, वह होता है संस्कार | मूलतः भारतीय संस्कृति को विश्व की अन्य संस्कृतियों से श्रेष्ठ इसलिए माना जाता है; क्योंकि भारतीय संस्कृति की उत्पत्ति संस्कारों से हुई है | संस्कार अर्थात् परिमार्जन अथवा शुद्ध करना | जैसे खान से निकले सोने को तपाकर शुद्ध किया जाता है तभी उसकी उपयोगिता बढ़ती है, वैसे ही व्यक्ति जो भी कृति करता है उसे विधिपूर्वक करे तो ही उसकी सार्थकता है, इसे ही सुनिश्चित करने को प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसे संस्कार करना कहा गया है और यह निर्विवाद तथ्य है कि संस्कारों की जननी ‘माँ’ है | हमारे दैनिक जीवन के विभिन्न क्रिया-कलापों से लेकर सामाजिक जीवन तक, सभी में संस्कारों का महत्त्वपूर्ण स्थान है | हमारी दिनचर्या में प्रातः ब्रह्म-मुहूर्त में जागरण, जागरण के उपरान्त भूमि-वन्दना, भोजन से पूर्व प्रार्थना और उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करने की कामना करना भी संस्कार के अन्तर्गत ही आता है | शयन के समय ईश्वर का स्मरण और व्यक्तिगत जीवन में सोलह संस्कारों का प्रचलन भी भारतीय सनातन संस्कृति की ही विशेषता है | संस्कार हमारी नैसर्गिक धरोहर हैं और हमारे मानवीय मूल्यों के प्रतीक भी हैं, इसलिए चाहे राष्ट्र संस्कार, मानवीय संस्कार या समाज संस्कार, कोई भी संस्कार हों, प्रत्येक संस्कार की उत्पत्ति मातृत्व भाव से होने के कारण, हिन्दुत्व का दर्शन, एक सम्पूर्ण मातृत्व का है, वात्सल्य का है, ममता का है और उसी के चलते हुए वसुधैव कुटुम्बकम् हो या अनेकता में एकता हो अथवा चरित्र निर्माण की प्रक्रिया, सभी को हम मातृत्व भाव से, माँ के रूप में ही देखते हैं | 

हिन्दू दर्शन एक सम्पूर्ण मातृत्व स्वरुप को लेकर प्रकट होता है और उस प्रकट भाव में विभिन्न संस्कारों का एकत्रीकरण या विभिन्न संस्कारों का एकात्मता के सूत्र में बंधना और उस संस्कार प्रक्रिया के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की चैतन्यता निर्माण कर, सामान्यजन में चेतना का निर्माण कर, राष्ट्र समाज और मानवता की चुनौतियों का एक ऐसा मंथन करना, जिसमें विष, रत्न आदि सभी बाहर आने के पश्चात्, इन चुनौतियों को विचार और अपने सार्थक कर्मों से कैसे उत्तर दिया जा सकता है ? इसकी अमृत प्राप्ति का जो पर्व है, वह ‘कुम्भ’ है |

 कुम्भ एक मेला नहीं, कुम्भ एक परम्परा नहीं; अपितु कुम्भ एक सम्पूर्ण व्यवस्था है, जो विष का शमन कर अमृत पान कराने का ‘योग’ प्रदान करती है | इसलिए कुम्भ राष्ट्र-चिन्तन, सामाजिक-चिन्तन, मानवीय मूल्यों के चिन्तन का, एक ऐसा स्वरुप है कि जिसके द्वारा हम सामाजिक विकृतियों, आडम्बरों और कुरीतियों को दूर कर, प्रत्येक बारह वर्षों में, समाज की आवश्यकता तथा मानवीय मूल्यों की आवश्यकताओं को समझ कर, सही परिप्रेक्ष्य में हम सुधार कर सकें ! वह शरीर क्या जो अस्तित्व न जाने ? वह आत्मा क्या जो विरक्ति न जाने ? आत्मा से शरीर के मिलन का, अपने अस्तित्व का निर्माण करते हुए, सम्पूर्ण विरक्त किस प्रकार रहा जा सकता है ? इसका सम्पूर्ण दर्शन ‘हिन्दुत्व’ है और उस हिन्दुत्व का जो सूर्य समान प्रखर, तेजस्वी और दैदीप्यमान प्रकटीकरण है, वह कुम्भ है |

सर्व विदित है कि देश के चार स्थानों पर कुम्भ महापर्व का आयोजन प्रत्येक बारहवें वर्ष किया जाता है और उसे कुम्भ मेला कहा जाता है; किन्तु सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है, इसलिए इसे सिंहस्थ भी कहा जाता है | प्रकट अथवा प्रत्यक्ष रूप में कुम्भ अथवा सिंहस्थ के आयोजन के अनेक उद्देश्य हैं जैसे पुण्य-प्राप्ति, ज्ञानार्जन, सत्संग-लाभ, तीर्थाटन आदि | सनातन संस्कृति के मुख्य अध्यात्म शास्त्रीय सिद्धान्तों में से एक सिद्धान्त, कर्मफल न्याय सिद्धान्त भी है; अतः व्यक्ति जैसा कर्म करता है, वही प्रतिफल रूप में उसे मिलता है | इसलिए अधिकाधिक पुण्य प्राप्त करने की क्रियाओं पर, प्रत्येक उस व्यक्ति का ध्यान रहता है जो सनातन धर्म तथा इसके मूल्यों में विश्वास रखता है | पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र-मंथन पश्चात् सुर-असुरों में अमृत वितरण के विवाद उपरान्त, अमृत-कलश से कुछ बूँदें जिन-जिन स्थानों पर गिरीं थीं, वहां कुम्भ मेला आयोजित किया जाता है और वहां तीर्थाटन तथा उस अवधि में वहां स्नान करने से पुण्य-प्राप्ति होती है; परन्तु इसका अप्रत्यक्ष उद्देश्य ‘गूढ़’ है, जिसे समझे बिना भी इसका लाभ सामान्यजन को मिलता रहा है |

 हमारी सनातन संस्कृति के पुरोधा, दूरदृष्टि सम्पन्न ऋषि-मुनि, समय-समय पर इस कालजयी संस्कृति पर होने वाले आघातों से रक्षण हेतु एक व्यवस्था का निर्माण कर गए हैं | इसी क्रम में जब मध्यकाल में, आसुरी शक्तियां व विदेशी आक्रान्ता वैदिक सनातन धर्म संस्कृति तथा परम्पराओं का विनाश करने में लगे थे, तब आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ और शास्त्र के द्वारा वैदिक धर्म परम्पराओं एवं मान्यताओं का रक्षण कर, वैदिक सनातन धर्म को पुनर्स्थापित किया । शास्त्रार्थ से समझ, सद्भावना व संचेतना समृद्ध होती है; परन्तु इस समझ, सद्भावना व संचेतना के प्रवाह को भी निरन्तरता की आवश्यकता है | शास्त्रार्थ की सार्थकता तथा उसकी लक्ष्य प्राप्ति हेतु उपयुक्त स्थान, उपयुक्त विद्वान, उपयुक्त वातावरण की आवश्यकता होती है, साथ ही शास्त्रार्थ के मंथन से प्राप्त ज्ञान रूपी ‘अमृत’ का समाज में वितरण, और यह वितरण समान रूप में देश के कोने-कोने में हो इस हेतु, तत्कालीन कालानुसार जो सर्वश्रेष्ठ माध्यम था वह है ‘कुम्भ महापर्व’ | यद्यपि तकनीक एवं सम्प्रेषण के साधनों की बहुतायत के युग में भी, कुम्भ की प्रासंगिकता तथा सार्थकता न्यून नहीं होती; अपितु और भी अधिक बढ़ गई है, क्योंकि हम यह समझ ही नहीं पाए हैं कि इन साधनों से हम एक-दूसरे के निकट आए हैं या हमारी परस्पर दूरियां और बढ़ गई हैं | किन्तु कुम्भ जैसे महापर्व हमारी इन दूरियों को मिटाने का सामर्थ्य निश्चित रूप से रखते हैं | जब हम अपने अपने आधुनिक सम्प्रेषण यंत्रों के साथ घर में होते हैं, तब भी अपने ही आभासी संसार में, समूह का भ्रम लिए, एकाकी ही होते हैं | जबकि कुम्भ जैसे महापर्व में परिवार तथा मित्रों के साथ पवित्र स्नान हेतु एक साथ डुबकी लगाना, यथार्थ में हमें एक परिवार के रूप में जोड़ता है | यह सामान्य सी; किन्तु अत्यन्त प्रभावकारी विशेषता है, जो कुम्भ हमें प्रदान करता है |

भारतवर्ष जैसे राष्ट्र की सांस्कृतिक विशेषताओं तथा विभिन्नताओं को देखते हुए इसे एकसूत्र में बाँधने की कल्पना को साकार रूप भी कुम्भ मेले से ही मिलता है | चार स्थानों पर कुम्भ परम्परा प्रारम्भ करने का श्रेय आद्य गुरु शंकराचार्य को ही दिया जाता है । यह स्वाभाविक भी लगता है; क्योंकि आद्य गुरु शंकराचार्य ने भारत के चार कोनों पर चार धामों की स्थापना की, जिसके कारण चार धाम की तीर्थयात्रा का प्रचलन हुआ । मान्यता यह भी है कि उन्होंने ही भारत की सन्तशक्ति को संगठित किया और भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग में धर्म-चेतना जगाने का दायित्व उन्हें सौंपा । इसके पीछे राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना, एकता तथा एकात्मता को जागृत करने एवं सुदृढ़ करने का दृष्टिकोण निहित था |

सिंहस्थ के अप्रत्यक्ष तथा गूढ़ उद्देश्यों में से एक अन्य उद्देश्य है, हिन्दू जागरण और  हिन्दू जागरण ही हिन्दुत्व की मूल-भावना है | ‘हिन्दू’ केवल एक शब्द नहीं है; अपितु यह एक विराट स्वरुप लिए, स्वयं में महान परम्पराओं तथा इतिहास को आत्मसात् किए हुए, एक सार्वभौम संस्कृति के उदात्त प्रकाश को प्रसारित करता ऐसा सूर्य है, जो मानवीय सभ्यता को अनन्त युगों से प्रकाशित कर रहा है | इसी हिन्दू शब्द को अपने अस्तित्व से ऊर्जा प्रदान करने वाली मानवीय सभ्यता तथा इसके वाहक ‘हिन्दू’ हैं | इन्हीं हिन्दुओं का जागरण और उनमें अपनी परम्पराओं के अनुरूप, चेतना का सम्प्रेषण भी ‘सिंहस्थ’ जैसे महापर्वों के माध्यम से ही होता है | सिंहस्थ जहाँ विभिन्न साधना मार्गों से साधना करने वालों का एकत्रीकरण होता है, संवाद होता है, वहां सामान्य व्यक्ति की जिज्ञासा का समाधान भी सहज ही हो जाता है | यह समाधान उसे एक सन्तुष्टि प्रदान करता है और यह सन्तुष्टि, श्रद्धा और विश्वास का रूप ले लेती है, जिसकी परिणति समष्टि रूप में, अन्य व्यक्तियों तक हिन्दुत्व का प्रसार करने की प्रेरणा तथा शक्ति प्रदान करती है, यही वास्तविक हिन्दू जागरण है | 

हिन्दू को आर्य भी कहा गया है और आर्य का शाब्दिक अर्थ होता है, श्रेष्ठ | वेद भी कहता है ‘कृण्वन्तो विश्वं आर्यम’ अर्थात् सभी (सम्पूर्ण विश्व को) को श्रेष्ठ बनाएंगे | यह श्रेष्ठता आवरण से नहीं, आचरण तथा अंतःकरण से अभिव्यक्त होना चाहिए | हम हिन्दू शब्दानुसार ‘हीनानि गुणानि दुष्यति इति हिन्दू’ अर्थात् स्वयं के हीन गुणों को दूर कर हिन्दू बनें और दूसरों को भी बनाएं ! यथार्थ रूप में हिन्दू होना श्रेष्ठता का परिचायक है | यदि विश्व का प्रत्येक व्यक्ति अपने दुर्गुणों को दूर कर ‘आर्यत्व’ को प्राप्त करले तो उसकी आत्मिक उन्नति में किसी भी प्रकार का संशय हो ही नहीं सकता, फिर चाहे वह किसी भी धर्म, पंथ, सम्प्रदाय, साधना-मार्ग का ही अनुयायी क्यों न हो ? व्यक्ति अपने षडरिपुओं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर पर विजय पा ले तो उसकी व्यक्तिगत, भौतिक, व्यावहारिक, सामाजिक तथा सभी प्रकार की समस्याओं का अन्त हो जाएगा और श्रेष्ठता को वास्तविक रूप में प्राप्त कर लेगा | श्रेष्ठता के इसी भावरूपी अमृत को पाने की प्रक्रिया का मंथन भी सिंहस्थ में ही होता है और यह भी हिन्दू जागरण का ही प्रतीक है |

सिंहस्थ कुम्भ जैसे महापर्वों का आध्यात्मिक ही नहीं वरन सामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्त्व भी है | हमारा भारत जो महानगरों तथा नगरों से अधिक ग्रामों में बसता है, वहां के परिवेश में पलने वालों के लिए भी कुम्भ अपनी उपयोगिता सतत् सिद्ध करता रहा है | इसी कुम्भ के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग को प्रभाव में लाने के लिए, प्रत्येक वर्ग के साथ न्याय करने के लिए, सम्पन्नता और विपन्नता का भेद मिटाने के लिए, समता और समरसता को परिभाषित करने के लिए, राष्ट्रवाद का, समाजवाद का शंखनाद करने के लिए, आवश्यकता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और धर्म, यह अन्तिम व्यक्ति तक सरलतम पद्धति से पहुंचे और कुम्भ के माध्यम से हम परिवर्तन का स्वरुप सामने लेकर आ सकते हैं और हमें लाना है | आज हमें समस्याओं का समाधान खोजना होगा और ऐसा पर्व जहां लाखों-करोड़ों लोग आस्था के साथ आते हों, उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान, यदि कुम्भ के माध्यम से हो तो कुम्भ की सार्थकता और बढ़ सकती है | जैसे कृषि विकास, ग्रामीण विकास, पशु संवर्धन, जल का नियोजन, पर्यावरण सन्तुलन, मातृशक्ति पर हो रहे अनेक प्रकार के अत्याचार हों, समाज में बढ़ती व्यभिचारिता हो, कुठाराघात हों, उस पर प्रहार करने वाले विचार और कार्यों का प्रदर्शन, जिसका लाभ धर्म के साथ हमारे सांसारिक जीवन में भी श्रद्धावान को प्राप्त हो, ऐसे कार्य करने की आवश्यकता है और इस आवश्यकता की पूर्ति सहज रूप से कुम्भ के माध्यम से हो सकती है |



कुम्भ महापर्व सनातन संस्कृति के उद्भव का भी माध्यम है | सनातन संस्कृति की व्यापकता को समझने के लिए इस संस्कृति द्वारा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की प्रार्थना का उदाहरण ही पर्याप्त है | सनातन संस्कृति के सिद्धान्त इसे महानता और अमरत्व प्रदान करते हैं | एक ओर जहाँ विश्व में अनेक प्राचीन और नवीन संस्कृतियाँ विद्यमान हैं, कई संस्कृतियाँ समय-समय पर उत्पन्न हुईं और काल के गाल में समा गईं, वहीं सनातन संस्कृति आज भी अपने मूल रूप में विद्यमान है | यद्यपि इस संस्कृति की ‘आत्मा’ पर विकृतियों का आवरण चढ़ा हुआ दिखाई देता है, तथापि इसकी जीवन्तता में कोई न्यूनता (कमी) नहीं आई है | जहाँ तक आवरण की बात है, तो उस आवरण को उतारने हेतु प्रयास सदैव होते ही रहे हैं, इसी कारण यह आज के ऐसे युग में भी चैतन्यता लिए विद्यमान है, जिस युग में अन्य संस्कृतियाँ केवल आत्म-केन्द्रित हो, हिंसा के क्रूरतम स्वरुप के साथ मात्र अपने मत की स्थापना में लगी हुई हैं और विश्व के साथ ही सम्पूर्ण मानवता के लिए भी घोर संकट बन गई हैं |

ऐसे समय सनातन संस्कृति की विश्व-पटल पर भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है; क्योंकि अन्य संस्कृतियाँ केवल मानवीय मूल्यों की बात करती हैं और उसे अपनी महानता समझती हैं | वहीं सनातन संस्कृति मानव और मानवता से भी आगे, सम्पूर्ण विश्व के मंगल की कामना करती है | केवल मानव ही नहीं, पशु-पक्षी, जलचर, नभचर, जड़-चेतन, सजीव तथा निर्जीव सभी के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना सिखाती है; क्योंकि इस संस्कृति का मूल तत्त्व मातृत्व भाव है |  यह सभी में उस एक परमात्मा के स्वरुप ‘ब्रह्म’ का दर्शन करना सिखाती है | मानवीय मूल्यों का संरक्षण, विचारों की परिपक्वता, भाषा की सौम्यता एवं उच्चता, आदर्श समाज रचना तथा जीवन पद्धति का समुचित मार्गदर्शन इस संस्कृति के वैशिष्ट्य को दर्शाते हैं | भोग यदि अनिवार्य है तो सनातन संस्कृति त्यागमय भोग के मार्ग का अनुसरण करने को कहती है और दातुन हेतु भी वृक्ष की शाखा तोड़ने के पूर्व वृक्ष से प्रार्थना कर उसकी अनुमति लेने और वृक्ष के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित करने का भाव इस सनातन संस्कृति में अन्तर्निहित है |

सनातन संस्कृति प्रकृति के प्रति करुणा का जो भाव रखती है, उसका एक उदाहरण है कृषि | यदि हम गेहूं का उदाहरण लें तो इस तथ्य से सभी परिचित ही है कि जो अन्न खेतों में उत्पन्न करते हैं, उस पर सम्पूर्ण अधिकार नहीं रखते; अपितु उस पर दूसरों का भी अधिकार हैं, जैसे उर्वरक के रूप में खेत का, चारे के रूप में पशुओं का, आहुति के रूप में अग्निदेव का, दानों के रूप में पक्षियों का, आटे के रूप में चींटियों का, रोटी के रूप में गोमाता, श्वानों (कुत्तों) आदि सभी का अधिकार मानते हैं, यह भी इस सनातन संस्कृति की विशेषता है |

    इसी यज्ञमय संस्कृति के अपनी सम्पूर्ण विराटता तथा समग्रता के साथ कुम्भ महापर्व में दर्शन होते हैं | चारों ओर यज्ञ, अन्नक्षेत्र, जिसमें स्नेहपूर्वक, आग्रहपूर्वक यात्रियों को बुलाकर भोजन करवाना, इस शाश्वत संस्कृति के मूल्यों के प्रकटीकरण को सिद्ध करता है | इस संस्कृति के शाश्वत तत्त्व को अक्षुण्ण रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं ‘कुम्भ’ जैसे महापर्व और सनातन संस्कृति के उद्भव के लिए कुम्भ महापर्व की यही उपादेयता है |



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