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श्री गणपति आदर्शों के संस्थापक हैं - श्री भय्यूजी महाराज

तारीख : September 02, 2016 कुल देखें : 165

भारतीय संस्कृति आदर्शों की संस्कृति है। हमारी संस्कृति में श्री राम, श्री कृष्ण के आदर्शों को हम व्यवहार में लाते हैं। साथ ही अन्य देवी-देवताओं की उपासना करते हैं। उसके पीछे भी यही उद्देश्य होता है कि उनके गुणों को उनके आदर्शों को हम आत्मसात करें। श्री गणेश भी ऐसे ही देव हैं, जिनके स्वरूप, आयुध मुद्रा आदि के द्वारा मानव जाति का हित निहित है। श्री गणपति के सदगुणों का चिंतन कर उनका स्मरण करें, उनकी उपासना करें। 

मनुष्य जब भी अपना नेता चुनता है तो पहले नेता के गुणों को देखता है। सभी देवों ने गणनायक के रूप में गणपति को चुना है। श्री गणपति के मस्तक पर चंद्र है, वह भालचंद्र कहलाते हैं अर्थात वे शांत हैं और चंद्र अनेक कलाओं का ज्ञाता है। ऐसे चंद्र को उन्होंने अपने मस्तक पर रखा है तो स्वयं गणपति भी सभी कलाओं के ज्ञाता है। अच्छे जीवन के लिए हमें सिर्फ भौतिक दृष्टि ही पर्याप्त नहीं है। हमें लौकिक दृष्टि की भी आवश्यकता होती है। इस लौकिक दृष्टि को देखने के लिए तीसरा नेत्र चाहिए अर्थात अंतर की दृष्टि चाहिए। श्री गणपति के तीनों नेत्र यह बताते है कि वे भौतिक जगत को तो देखते ही हैं, साथ में अलौकिक जगत को भी देखते हैं और दोनों में समन्वय बनाने की प्रेरणा देते हैं। 

जो गणनायक होता है, उसे सभी की समस्या सुनना होती है तथा सभी के साथ प्रसन्न मुद्रा में रहना होता है। श्री गणपति की मुद्रा प्रसन्न रहती है तथा मस्तिष्क भी विशाल है। उनका महामस्तक ही अनेक पुरुषों की समस्याओं को सुन सकता है और उन्हें संतुष्ट रख सकता है। सबके मन की बात को जानने के लिए उनकी दीर्घ नासिक है, जो अंतः स्थल को सूंघ सकते हैं अर्थात उसका पता लगा सकते हैं। ऐसे श्री गणेशजी की लम्बी सूंड है। उनके वक्रतुण्ड होने का तात्पर्य है कि सामाजिक कार्य करने वाला दूसरों के विरोध की परवाह नहीं करता और उस और ध्यान नहीं देता और अपना कार्य करता रहता है। ऐसे ही श्री गणेश हैं। उनके बड़े कान और विशाल उदर भी यही दर्शाता है कि वे सबकी समस्याओं को गंभीरता से सुनते हैं और किसी का भी अनादर नहीं करते। उनका रक्तवर्ण वस्त्र यह दर्शाता है कि वे सभी को स्नेहमयी दृष्टि से देखते हैं। उनके श्वेत वस्त्र भी यही दर्शाते हैं कि समाज में रहने वाले सभी लोगों को एक-दूसरे के प्रति पवित्र भाव रखना चाहिए। अपने हाथों की अभय मुद्रा से वे ये बताते है कि जो गणनायक है, उसे अपने अहंकार और स्वार्थ में नहीं रहना चाहिए, बल्कि दूसरों के कल्याण के लिए तत्पर रहना चाहिए। उनके हाथों में अंकुश तथा पाश है। जो लोग दुराचारी हैं, उन पर अंकुश लगाना आवश्यक है और पाश से प्रेम का आकर्षण देकर वे एक-दूसरे को परस्पर सदभावनाओं के लिए प्रेरित करते हैं। 

श्री गणेश के दोनों और रिद्धि-सिद्धि विराजमान है। वे कहते हैं कि जो स्त्रियां अपने पति का आदर करती हैं, सत कार्यों में उसका सहयोग करती है, वे  रिद्धि-सिद्धि बन जाती हैं। स्वामी को अपने अधीनस्थ सेवा कार्य में रहने वाले के प्रति तुच्छ भाव प्रकट नहीं करना चाहिए, चाहे अधीनस्थ कितना भी छोटा हो, इसलिए उन्होंने वाहन के रूप में मूषक को रखा है। भगवान गणपति दो माताओं का आदर करते हैं एक गौरी और दूसरी गंगा। वे दोनों ही माताओं का आदर करते हुए यह दर्शाते हैं कि माताओं का आदर करना चाहिए। श्री गणपति अनेक सदगुणी तत्वों के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उनकी आराधना कर हम अपने सदगुणों को बढ़ाएं। 

जय हिंद, जय भारत !!



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