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सीखने की प्रवृत्ति को जाग्रत करने वाला पर्व गुरुपूर्णिमा

तारीख : July 09, 2017 कुल देखें : 20

सीखने की प्रवृत्ति देने वाला प्रकाश पूर्णिमा है और सीखने की प्रवत्ति को जाग्रत करने वाला पर्व 'गुरुपूर्णिमा' है। गुरुपूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। श्री वेदव्यासजी ने चारों वेदों का संपादन कर अनेक पुराणों की रचना की। पुराणों के माध्यम से उन्होंने मानव जाती को कल्याण का मार्ग दिखाया। जो कल्याण का मार्ग दिखता है, वह गुरु है। साधक इस व्यास पूर्णिमा पर गुरु पूजन करते है। अपने गुरु के प्रति सम्मान आदर प्रकट करने का यह दिन होता है। प्रकृति के अनुसार यदि हम चलते है तो आषाढ़ पूर्णिमा वर्षा के प्रारम्भ की घोषणा करती है। ग्रीष्म ऋतु में मेघो के पास जो संचित जल होता है, वह पृथ्वी पर आने के लिए उत्सुक रहता है, जो नवजीवन का प्रतिक है। यही समर्पण का भी प्रतीक है। साथ ही जो तत्व ज्ञान हमने अर्जित किया है, उसे सत्कार्य में परिणित करने का यह दिवस होता है। अनेक शिष्य गुरुपूर्णिमा से ही साधना प्रारम्भ करते है, क्योंकि इस दिन गुरु शिष्य पर कृपा बरसाते है। गुरु अपने शिष्य को भक्ति का मंत्र देते है। उस भक्ति से वह ईश्वर की आराधना कर अपने दिव्य गुणों का प्रसार और विस्तार करता है। भक्ति मंत्र के बदले में गुरु शिष्य से सत्कार्यों के प्रति समर्पण चाहते है। शिष्य के लिए गुरुपूर्णिमा इसलिए विशेष होती है कि जो कुछ आध्यात्मिक जगत में सीखा है, सुना है, देखा है, उन सबको एकत्रित करके विश्व प्रेम की भावनाओ को साकार करना, जिससे वसुधैव कुटुंब का भाव जाग्रत हो। पुरे वर्ष भर शिष्य इसी दिन की प्रतीक्षा करता है, क्योंकि गुरु की दृष्टि ही साधक के मोहपाश को काटती है और उसे नवीन राह दिखाती है। एक बार एक नवदीक्षित शिष्य ने गुरु से कहा- गुरुदेव उपासना में मन नहीं लगता। भगवान की और चित्त दृढ़ नहीं होता। गुरु ने गंभीर दृष्टि डालकर शिष्य की और देखा और शिष्य से कहा- सच कहते हो वत्स, यहाँ ध्यान नहीं लगेगा। आज सायंकाल ही हम यहाँ से प्रस्थान करेंगे। शिष्य ने कुछ डरते हुए संकोच करते हुए पूछा- सायंकाल प्रस्थान करेंगे? गुरु ने उसका कोई उत्तर नहीं दिया। गुरु शिष्य सायंकाल दूसरे स्थान पर प्रस्थान करने हेतु चल पड़े। शिष्य के हाथ में एक झोला था, जिसे वह बड़े यत्न से संभाल रहा था। चलते समय भी उसका ध्यान उस झोले पर अधिक था। मार्ग में एक कुआँ आया। दोनों ने अपनी प्यास बुझाई और थोड़ा विश्राम करने का सोचा। इतने में शिष्य ने शौच की आशंका जताई और गुरु को अपनी झोली देकर वह चल दिया। जाते- जाते अनेक बार उसने झोली की तरफ देखा। कुछ दूर जाने पर उसे धड़ाम एक तीव्र प्रतिध्वनि सुनाई दी। उसे यह अनुभव हुआ कि कोई वास्तु कुएं में समां गई है। शिष्य दौड़ा हुआ आया और चिंतित स्वर में बोला- गुरुवार, झोले में सोने की ईंट थी, वह कहां गई। गुरुदेव ने शांत स्वर में कहा- कुएं में चली गई। अब कहे तो चले या फिर पुनः अपनी जगह ही लौटें। अब तुम्हे ईश्वर में ध्यान लगने की कोई चिंता नहीं रहेगी। शिष्य ने एक दीर्घ श्वास छोड़ते हुए कहा- सच है गुरुदेव, आसक्ति का मन से परित्याग किये बिना कोई भी ईश्वर में मन नहीं लगा सकता। गुरु वह है जो आसक्ति को हमारे भीतर से निकाल कर शिष्य को भक्ति का मन्त्र देते है। इस भक्ति से शिष्य संतुष्टि की संपत्ति प्राप्त करता है, जिससे जीवन में अनेक समस्याओ का वह सामना करता है। गुरु कहते है समस्त जगत को गुरु स्वरूप देखो। गुरु वह है जो हमारे ज्ञान का विस्तार करते है। प्रकृति में प्रत्येक तत्व ऐसा है, जो हमें कुछ न कुछ गुण देता है। जब हम इस प्रकृति को समझते है, इसके गुण तत्व को समझते है तो हम सद्गुणी हो जाते है। भगवान दत्तात्रय ने स्वयं अपने जीवन में 24 गुरु बनाये और मानव जाती को यह बताया कि प्रत्येक पदार्थ में विशेष गुण होता है। उस गुण को हमें आत्मसात करना चाहिए। जब समस्त जगत को गुरु स्वरुप देखोगे तो प्रत्येक वस्तु का आदर करोगे। गुरु पूर्णिमा इसी संकल्प को स्मरण करने का दिवस है, जिससे अनंत सवेंदनाओ का विस्तार होता है और सत्कार्य मूर्तरूप लेकर हमारे सामने होते है। हम ग्रहणशीलता के मूर्तरूप बने। अपनी क्षुद्र अहम भावना से रिक्त रहे, तब प्रकृति की समस्त निधियां हमारे भीतर समाती है और शिष्य अपने श्वासों में उस शुद्धता को अनुभव करता है, जो पर्वत से गुजरने वाली हवाओं की तरह शुद्ध और सात्विक है। यही अनुभव ही गुरु पूर्णिमा है। 



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