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साबरमती आश्रम के स्थापना के 100 वर्ष पुरे होने पर आश्रम से प्राप्त मानवता, सामाजिकता, और देश निर्माण पर चर्चा

तारीख : July 17, 2017 कुल देखें : 19

आज साबरमती आश्रम के स्थापना के 100 वर्ष पुरे होने पर आश्रम से प्राप्त मानवता, सामाजिकता, और देश निर्माण पर चर्चा करते है –

जब हम जीवन में तेजी से आगे बढ़तें हैं तो हमारे अनुभवों में भी वृद्धि होती है, यह वृद्धि या तो सुख की होती है या दुःख की, जब हम आगे बढ़तें हैं तो हमारे मस्तिष्क में स्वयं और समाज के लिए विचार भी विकसित होते है, ठीक अनुभव की तरह या तो सुविचार या फिर कुविचार, इन्हीं विचारों का विकास यदि सही तरीके से किया जाए तो एक सभ्य समाज का निर्माण होता है और सभ्य समाज ही राष्ट्र की प्रगति का प्रतीक है |

प्राचीन काल में विचारों की शुद्धता के लिए बचपन से ही बच्चों को आश्रम पहुँचाया जाता था ताकि बच्चो में मौलिक शिक्षा, शास्त्रों एवं अस्त्रों की शिक्षा के साथ साथ आत्मनिर्भर बनाना एवं प्रत्येक परिस्थिति में सकारात्मक विचार धारण करना एवं स्वयं सारे कार्यों को करना सिखाया जाता था, ताकि बच्चे आश्रम अवधि समाप्त होने के पश्चात सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज निर्माण में योगदान दे सके | 

राष्ट्र हित, मानव हित, शिक्षा, चिकित्सा, आत्मीयता तथा भक्ति के उद्देश्य से आश्रम की स्थापना की जाती थी और अब फिर से आश्रम व्यवस्था को मुख्य धारा में लाने की कोशिश हो रही है जो प्रशंसनीय हैं |

आश्रम भारतवर्ष का आधार रहा है , आश्रमों में सदाचार, शिष्टाचार तथा जीवन जीने की सकारात्मक सोच विकसित की जाती है| 

प्रभु श्रीरामचन्द्र जी ने आश्रम में ही गुरु विशिष्ट से धर्म के मार्ग पर मर्यादाओं के साथ चलने की शिक्षा ली , एवं मर्यादापुरुषोत्तम कहलाएँ , लेकिन जब प्रभु रामचंद्र जी 14 वर्ष के वनवास पर गये तब आश्रम की गरिमा एवं नियम को तोड़कर रावण ने सीता का अपहरण किया जो राक्षसों के वंश के विनाश का कारण बना |

आश्रम के अपने नियम एवं अपनी गरिमा होती है, जो चरित्र का निर्माण करती है, तथा आश्रम की गरिमा एवं नियमों को तोड़कर किया गया कार्य विनाश लेकर आता है |

आश्रमों में किये गए कार्यो से ही समाजिक परिवर्तन लाया जाता है , जैसे सबरी के आश्रम में ही श्रीराम जी के पधारने पर कवी कहतें है ..

जाती-पांति कुल धर्म बड़ाई | धन बल परिजन गुण चतुराई ||

भगती हीन नर सोहई कैसा | बिनु जल बारिद देंखीअ जैसा ||

मतलब जाति-पांति, कुल बड़ाई, धर्म, दहन, बल, कुटुंब, गुण और चतुरता इन सबके होने पर भी इंसान भक्ति न करे तो वह ऐसा लगता है, जैसे जलहीन बादल दिखाई देते है |

आश्रमों का हमारे लिए बहुत महत्त्व है , ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में ही रामायण लिखी गई जो हमें जीवन की परिस्थितियों से अवगत कराती है और विचारों में सकारात्मकता लाती है | वेद व्यास के आश्रम से ही भरत वंश का नाम बढ़ा |

आश्रमों में ही भारतवर्ष का इतिहास निहित है , जहाँ कई रचनाएँ, ग्रन्थ, वेद, तथा काव्यों का निर्माण किया गया है , मानवता का विकास किया गया तथा राष्ट्र के प्रति सहयोग एवं जागरूकता फैलाई गयी है | 

ऐसा ही एक है, साबरमती आश्रम, जिसकी स्थापना आज ही के दिन 100 साल पहले महात्मा गांधी द्वारा विभिन्न धर्मो में एकता स्थापित करने, चरखा, कड़ी एवं ग्रामोधोग द्वारा जनता की आर्थिक स्थिति सुधारने और अहिंसात्मक सहयोग तथा सत्याग्रह के द्वारा जनता के मन में स्वतंत्रता की भावना जाग्रत करने के लिए की गई | साबरमती आश्रम राष्ट्रीय धरोहर हैं, जहाँ जन कल्याण एवं स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए कई कार्य किये गए | 

आश्रमों का अस्तित्व वहां किये गए या प्रचलित कार्यो से होता है | ऐसे ही सूर्योदय आश्रम द्वारा अध्यात्म की शिक्षा, मानवता की शिक्षा ( प्रत्येक जीवों से लगाव ), कृषि सम्बंधित शिक्षा, पर्यावरण सम्बंधित शिक्षा तथा राष्ट्र चेतना के प्रति शिक्षित किया जा रहा है | 

हमें आपसे अनुरोध है की आइये एक बार हमारे कार्यों को देखकर हमें प्रोत्साहित करे और हमारा साथ दे |

विकास और भारत माता की ओर हमारा दायित्व और उस पर अमल करते हुए आगे बढ़कर देश को खुशहाल बनाने का लक्ष्य पूरा करने में आप सभी का सहयोग चाहता हूँ ....



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