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परतन्त्रता संसार का सबसे बड़ा अभिशाप है

तारीख : May 09, 2015 कुल देखें : 157

एक सन्त के आश्रम में एक शिष्य कहीं से एक तोता ले आया और उसे पिंजरे में
रख लिया। सन्त ने कई बार शिष्य से कहा कि “इसे यों कैद न करो। परतन्त्रता
संसार का सबसे बड़ा अभिशाप है।” किन्तु शिष्य अपने बालसुलभ कौतूहल को न रोक
सका और उसे अर्थात् पिंजरे में बन्द किये रहा।

तब सन्त ने सोचा कि
“तोता को ही स्वतंत्र होने का पाठ पढ़ाना चाहिए” उन्होंने पिंजरा अपनी कुटी
में मँगवा लिया और तोते को नित्य ही सिखाने लगे- ‘पिंजरा छोड़ दो, उड़
जाओ।’
कुछ दिन में तोते को वाक्य भली भाँति रट गया। तब एक दिन सफाई करते
समय भूल से पिंजरा खुला रह गया। सन्त कुटी में आये तो देखा कि तोता बाहर
निकल आया है और बड़े आराम से घूम रहा है साथ ही ऊँचे स्वर में कह भी रहा
है- “पिंजरा छोड़ दो, उड़ जाओ।”
सन्त को आता देख वह पुनः पिंजरे के
अन्दर चला गया और अपना पाठ बड़े जोर-जोर से दुहराने लगा। सन्त को यह देखकर
बहुत ही आश्चर्य हुआ। साथ ही दुःख भी।
वे सोचते रहे “इसने केवल शब्द को ही याद किया! यदि यह इसका अर्थ भी जानता होता- तो यह इस समय इस पिंजरे से स्वतंत्र हो गया होता!

कहने
का तात्पर्य यह कि - हम सब भी ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें सीखते और करते तो
हैं किन्तु उनका मर्म नहीं समझ पाते और उचित समय तथा अवसर प्राप्त होने पर
भी उसका लाभ नहीं उठा पाते और जहाँ के तहाँ रह जाते हैं।


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