श्री सदगुरु दत्त धार्मिक एवं पारमार्थिक ट्रस्ट

प्रेस विज्ञप्ति

विद्रोह के शोर में गायब देशभक्ति  25-02-2016

देशविरोधी हरकतें करने वालों के चाहने वाले, गला फाड़-फाड़ कर देश की अस्मिता को चुनौती देते रहे पर वह यह भूल रहे है की हम भारत में है और हम उसका उसी तरह हिस्सा है जिस तरह इस देश के लिए मर मिटने वाले शहीद| देशविरोधी हरकतें करने वालों जेएनयू  छात्रों का ध्यान देश के शहीद लांसनायक हनुमनथप्पा कीऔर उनंके  ९  वीर सपूतों पर नहीं गया जिन्होंने सियाचिन में अपने प्राणों की आहूति दे दी। जेएयू के इन तथाकथित पढ़े-लिखे बुद्धिजीवियों में से किसी ने भी, इतनी ज़हमत नहीं उठाई कि ये उन१०  शहीदों की शान में दो शब्द कह सकें। शहीदों ने  देश और देशद्रोह  करने वालों जेएनयू  छात्रों के लिए भी 35 फुट ऊंची बर्फ की दीवार का बोझ 6 दिनों तक अपने शरीर पर झेला लेकिन इन लोगों ने ये कहकर इनकी शहादत का मज़ाक उड़ा दिया कि कश्मीर भारत का हिस्सा है ही नही । देश के यह वीर भारत माता की जय का नारा लगते हुवे शहीद हुए और जेएनयू  छात्र पाकिस्तान जिदाबाद और भारत के बर्बादी के नारे लगते रहे |
यह हमारे सिस्टम का सबसे बड़ा मजाक है की आतंकी अफज़ल गुरू के समर्थन में जिस तरह बंदूक के दम पर आज़ादी छीनने की बात की जा रही है उसके बाद पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाये जाते है। और हमारे देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी का झंडा उठाने वालों की नई जमात कड़ी हो जाती है |जो लोग ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के हिनायती है वह ध्यान दे की कही वह राष्ट्र विरोधी गतिविधियों बढ़ावा तो नहीं दे रहे हैं। ‘आज़ादी’ का खोखला, असल में अलगाववादी नारा है जो अरसे से कश्मीर में  किराये के आतंकियों, घुसपैठियों, सीमा पार से भागकर आए अपराधियों के पक्ष में चुनिंदा ताकतें हैं जो ऐसा कर रही हैं।जो लोग जेएनयू में हुवे शर्मशार घटना ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ से जोड़ रहे है उन्हें मै साफ़ शब्दों में कहुगा की यह सिर्फ और सिर्फ  देशद्रोह है ।

हमें यह समझाना होंगा की “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक जुमला” नहीं है। संविधान के अनुसार दिया गया श्रेष्ठ अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक आदर्श व्यवस्था है। इसका दुरुपयोग निशिचित ही दुखदायी होंगा|

“कश्मीर आज़ादी मांगे” , 'पाकिस्तान जिंदाबाद'  यह  कई सालो से कुछ मुट्‌ठीभर अलगाववादी कश्मीर में कर रहे है यह उनकी मांग है– शायद ये सब एक बार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में आ भी जाए -किन्तु भारत की बर्बादी? 'तुम कितने अफजल मारोगे घर-घर से अफजल निकलेगा'“ आखिरी समय तक जंग रहेगी” ? जिस देश का नामक खा रहे है उसकी बर्बादी  वो कैसे आएगी, किस अधिकार के अंतर्गत?  घटना ‘अभिव्यक्ति की आझादी’ की दुहाई देने वाले क्या इस सवाल का जवाब दे पाएंगे?

हिंदुस्तान ही केवल ऐसा देश है , जो सभी धर्मों, सभी संस्कृतियों का सम्मान करने के आधार पर समाज निर्माण का ख्वाब देखता है | क्या हम भूल गए की इस देश को बर्बाद करने आए मुग़ल साम्राज्य की केवल इटे और फथर बाकि है। देश को लुटने  आए ब्रिटिश साम्राज्य की दयनीय स्थिति यह है कि उनके प्रधानमंत्री, हमारे प्रधानमंत्री से मदत की गुहार लगते है!’ और महात्मा गांधी को ‘भूखा-नंगा फकीर’ कहने वाला इंग्लैंड  -उसी फकीर की विराट प्रतिमा अपने संसद में उन्हीं की छाती पर लगवाती है!  और, भारत की बर्बादी का ख्वाब देखने वाला पाकिस्तान -उसकी क्या हालत है? हम सब देख ही रहे हैं ?

मै यहा याद दिलाना चाहुगा की भारत, किसी जमीनी दुकड़े का नाम नहीं है, बल्कि  भारत माता है। यहा की संत, महात्मा, महापुरुषों के ख्वाबो में बसने वाला विश्व-गुरु है। प्रेम और शांति-पुंज है । हमारी और हमारे सविधान के उदारता का  कोई गलत फायदा उठा रहा को तो वह उसकी नादानी भर है |

हमारे देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी का झंडा उठाने वालों की कमी नहीं है लेकिन हमारा संविधान और हमारा कानून कहता है कि ये अभिव्यक्ति की आज़ादी असीमित नहीं है। देश का संविधान और कानून अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में देश को तोड़ने वाली बातें कहने की इजाज़त नहीं देता। अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रविरोधी हरकतें करेगा तो कानून को उसके खिलाफ ज़रूर कार्रवाई करनी चाहिए फिर चाहे वो किसी भी विचारधारा का हो किसी भी पार्टी का हो, किसी भी जगह पर बैठा हो, किसी भी कैंपस में बैठा हो। ऐसा कैसे हो सकता है कि देश का कानून जेएनयू कैंपस में लागू नहीं होगा?

जेएनयू के उन छात्रों को सिर्फ़ नारे लगाना, आंदोलन करना,कैंडिल मार्च निकालना और बड़ी बड़ी बातें करना गर्व की बात लगती है । अफसोस की बात ये है जिस यूनिवर्सिटी को समाज के मुद्दों और अनुसंधान पर काम करना चाहिए। वोआज नेतागीरी का सबसे बड़ा अड्डा बन गया है पिछले कई दशकों से जेएनयू पढ़ाई-लिखाई से ज़्यादा बौद्धिक अहंकार के गढ़ के रूप में स्थापित हो गया है।

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में 8 हज़ार 308 छात्र पढ़ते हैं। हर वर्ष जेएनयू को सरकार से 244 करोड़ रुपये एड और सब्सिडी के तौर पर मिलते हैं। यानी देखा जाए तो एक छात्र की पढ़ाई पर सरकार औसतन 3 लाख रुपये ख़र्च करती है।यह सब पैसा देश के तमाम उन लोगो का है जो टेक्स के रूप में देते है |

आज सम्पूर्ण देश की यूनिवर्सिटीज और कॉलेज में औसतन26 छात्रों पर 1 टीचर है।-लेकिन जेएनयू में औसतन 15छात्रों के लिए 1 टीचर है। फिर भी इसके बावजूद जेएनयूऔर उनके छात्रों का नाम दुनिया की टॉप 200 यूनिवर्सिटीज़ में नहीं है। जब पूरे देश में दुर्गा पूजा मनाई जाती है तो जेएनयू के अंदर महिषासुर दिवस मनाया जाता है। जेएनयू में वर्ष2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ के 75 जवानों की मौत पर विजय दिवस के तौर पर जश्न मनाया गया था।  मतलब यानी जेएनयू में गैरकानूनी और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का पुराना इतिहास है | आज जेएनयू के हालातो को देशभक्ति और देशहित के पैमाने पर तौलना ज़रूरी है।

जेएनयू जैसी यूनिवर्सिटी में आखिर किस तरह की विचारधारा पनप रही है जहां मुट्ठीभर लोग आतंकवादियों को हर कीमत पर शहीद साबित करने में तुले हैं। और सबसे बड़ा सवाल ये है, कि संसद हमले की साज़िश रचने वाले अफज़ल गुरू जैसे आतंकवादी के समर्थन में गला फाड़ कर नारे लगाने वाले ये लोग, आखिरकार देश को क्या संदेश देना चाहते हैं?  क्या ये हमारे देश की अजीब विंडबना नहीं है कि चंद लोग संसद हमले की साज़िश रचने वाले अफज़ल गुरू जैसे आतंकवादी का नाम तो सम्मान से लेना चाहते हैं लेकिन संसद हमले में शहीद हुए देश के उन वीर सपूतों का नाम कोई याद नहीं रखता जिन्होंने अपनी जान की बाज़ी लगाकर लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर की रक्षा की थी। अफज़ल के लिए नारे लगाने वालों ने, क्या कभी संसद हमले के शहीदों के परिवारों का दर्द समझने या जानने की कोशिश की है? ये वो चुभने वाले सवाल हैं की भारत में  पैदा होने वाले ये लोग एक आतंकवादी के पक्ष में नारेबाज़ी तो करते हैं लेकिन भारत के लिए मर-मिटने वाले नायकों का सम्मान नहीं करते। और नहीं इन लोगों को आत्महत्या करने वाले  किसान और उनके परिवारों का दर्द नहीं दिखता l जो अपने देश का नहीं हो सका वो किसी का भी नहीं हो सकता।

हमारे समाज में शरारती तत्व हर जगह मौजूद हैं और आज  समय की मांग है, कि हम सब इस उन्माद से बाहर आकर देशहित के बारे में सोचें क्योंकि जो गलत है वो गलत है और जो सच है वो हमेशा सच ही रहेगा।

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यह सही समय है की हम अपने आजादी और स्वैराचार के व्याख्या स्पष्ट करे, सीमा का मतलब आझादी में अडचने नहीं होती बल्कि मर्यादा होती है और यह मर्यादा हर किसी को लागू है, वरना आकाश में उड़ने वाले परिंदे भी अन्तरिक्ष की सैर करते | आझादी का मतलब उन आदर्श उच्च मूल्यों से युक्त सीमा से है जो हमें सुसंस्कृत, सभ्य और अखंड समाज का निर्माण करने का और उसमे अपनी जिम्मेदारी का गंभीरतासे निर्वहन करने का मौका देता है |
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जय हिन्द।
 

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