श्री सदगुरु दत्त धार्मिक एवं पारमार्थिक ट्रस्ट

परम पूज्य गुरुदेव के सन्देश

पाद्य पूजा के स्थान पर वृक्ष पूजा – जिस प्रकार गुरु ज्ञान देते समय शिष्यों में भेदभाव नहीं करते और कठिन समय में जिस प्रकार गुरु साथ देते हैं, वृक्ष भी उसी प्रकार अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं | वृक्ष भी छाया, औषधि, फल-फूल सभी को समान भाव से प्रदान करते हैं, इसलिए गुरु पाद्य पूजन में जल चढ़ाने की अपेक्षा वृक्षों को सींचना श्रेयस्कर होगा ताकि जिस प्रकार जीवन को सार्थक दिशा प्रदान करने वाले गुरु को कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु उनका पाद्य-पूजन करते हैं, उसी प्रकार प्राणवायु (ऑक्सीज़न) से लेकर आहार तक उपलब्ध कराने वाले वृक्षों के प्रति भी कृतज्ञता का भाव रख वृक्ष पर जल चढ़ाएं तो गुरु के गुणों को भी आत्मसात् कर पाएंगे तथा वैश्विक ऊष्मा (ग्लोबल वार्मिग) जैसी चुनौतियों का भी उत्तर दे सकेंगे |


संस्कारों की कल्पना नारी के बिना सम्भव नहीं : किसी भी संस्कार की कल्पना नारी के बिना सम्भव नहीं है, क्योंकि प्रत्येक उत्पत्ति का स्रोत नारी ही है | फिर चाहे नारी को भूमि, धर्म, राष्ट्र, गौ (गाय) या जन्म देने वाली जननी के रूप में ही क्यों न देखा जाए ? नारी किसी भी क्षेत्र में हो, चाहे वह किसी भी रूप में हो प्रेम, वात्सल्य की मूर्ति है, इसलिए वह सम्मानीय होती है |


सत्य से मिलती है मुक्ति : सत्य वह है जिसे हम अनुभव करते हैं, बांटते हैं, परिवर्तन करते हैं | सत्य हमें चिन्तन देता है | वह सिद्धान्तों का निर्माण करता है और वह सिद्धान्त हमें नियमों पर चलना सिखाते हैं | जब वही सत्य हमें लक्ष्य निर्धारित कर एकाग्रचित बनाता है तो सत्य यश में परिवर्तित हो सन्तुष्टि प्रदान करता है | तदुपरान्त यही सन्तुष्टि विरक्ति देती है और विरक्ति से मुक्ति मिलती है |


इससे है भारतीय धर्म की पहचान : : भारतीय धर्म की पहचान तीन बातों से है | पहली बात है, “वसुधैव कुटुम्बम्” | दूसरी बात है, “अनेकता में एकता” | तीसरी पहचान है, “सत्यता” | आज ये तीनो बातें मानो अदृश्य हो रही हैं |


राष्ट्र चेतना पर्यावरण महायज्ञ : आपको यज्ञ में आहुति के पश्चात् प्रसाद के रूप में पौधा मिलता है, उस पौधे को प्रत्येक व्यक्ति अपने आदर्श, पूर्वज, पितृ, प्रियजन स्वरुप मानकर ग्रहण कर रोपित करे | ऐसा करने से उस पौधे से हमारी संवेदनाएं जुडती हैं और यह प्रक्रिया वैश्विक ऊष्मा (ग्लोबल वार्मिग) का उत्तर देने के लिए सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होगी |


राष्ट्र का भविष्य इन्ही के हाथों में है : बच्चों को उचित मार्गदर्शन, संस्कार और योग्य शिक्षा देना नितान्त आवश्यक है; क्योंकि ये देश का उज्ज्वल भविष्य हैं और आशातीत परिवर्तन करने की क्षमता इन्ही में हैं | जो बच्चे धन के अभाव में या परिस्थिति वश शिक्षा ग्रहण करने में असमर्थ हों उन्हें शिक्षित करने के लिए आप सहायता करें !


खर्चे बचाकर सत्कार्य करे :प्रायः हम अनावश्यक व्यय (फ़िज़ूल खर्च) करते हैं, अनुपयोगी वस्तुएं खरीदते हैं | स्वाद न भाने पर अन्न छोड़ते हैं; परन्तु आसपास ऐसे भी कई निर्धन व्यक्ति हैं, जो एक समय की भूख भी शान्त नहीं कर पाते | यह हमारा दायित्त्व है कि हम अपने अनावश्यक व्ययों में से कुछ बचाकर इन निर्धनों के लिए सत्कार करें !


समय व्यर्थ न गवाएं : समय से बहुमूल्य संसार में कुछ नहीं है; क्योंकि एक बार व्यर्थ किया हुआ समय पुनः लौटता नहीं | हम प्रायः व्यर्थ बातों में, टी.वी. टेलीविज़न धारावाहिकों में या निष्काम घूमने-फिरने में समय नष्ट करते हैं | यदि यही समय सत्कार्यों या भगवत कार्यों में, नाम-स्मरण आदि में उपयोग करें तो जीवन को एक नयी सन्तुष्टि प्राप्त होगी |


माता-पिता की सेवा करें : माता-पिता से बढकर कोई देव, कोई ईश्वर नहीं | हमारे जन्म लेने से बड़े होने तक वे हमारे सभी कष्टों को अपनाकर हमारा पालन-पोषण करते हैं | हमारा भी दायित्व बनता है कि हम उनकी सेवा कर इस ऋण को चुकाएं | माता-पिता की सेवा के फल से ही जीवन में उन्नति सम्भव है |


आचरण को शुद्ध करें : आचरण की शुद्धता से मन में पवित्रता आती है और मन की पवित्रता से जन्म लेती है शान्ति, शान्ति से विकास को गति मिलती है | हम सभी विकास चाहते हैं और आचरण में शुद्धि के बिना यह सम्भव नहीं, यह हमें सोचना चाहिए !


खोखले आडम्बरों से दूरी बनाये : आडम्बर मनुष्य को प्रकृति, आन्तरिक शक्ति, स्वच्छ विचारों से दूर करते हैं | आडम्बरी व्यक्ति न तो कभी प्रेम की शक्ति समझता है और न ही दया के भाव को आत्मसात् कर पाता है | आडम्बर से वह दुःखों के सुख होने का खोखला प्रदर्शन करता रहता है |


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