श्री सदगुरु दत्त धार्मिक एवं पारमार्थिक ट्रस्ट

प.पू. गुरुदेव के सिद्धांत

(मानवता, राष्ट्रीयता, सेवा, समर्पण एवं आचरण)

सिद्धान्त जीवन में एकाग्रता की प्राप्ति कराते हैं | एकाग्रता और लक्ष्य के माध्यम से सिद्धान्त हमारे जीवन में कर्म की गंगा को अवतरित कराते हैं | ऐसी गंगा जो हमें निरन्तर आनन्द की लहरों से परिपूर्ण कर देती है और हमारे अन्दर आत्मसन्तुष्टि का भाव जाग्रत करती है | प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसका जीवन सुखमय और शान्तिपूर्ण हो | युग की आवश्यकतानुसार व्यक्ति अपने सिद्धान्त निर्धारित करता है, चाहे वह परमार्थ का लक्ष्य हो, चाहे परमात्मा की प्राप्ति का |


जीवन में प्रत्येक व्यक्ति के अपने सिद्धान्त होते हैं | जिसके सिद्धान्त मानवीय मूल्यों पर आधारित होते हैं, जो केवल समाज कल्याण का ही चिन्तन करते हैं, वे इस भूमि पर सन्त कहलाते हैं, मनीषी कहलाते हैं | सद्गुरु श्री भय्यूजी महाराज निरन्तर समाज कल्याण का ही चिन्तन करते हैं | व्यवहार में सरल, सहज दिखाई देने वाले गुरुदेव कठोरता से अपने सिद्धान्तों का पालन करते हैं | उनकी वाणी से, उनके व्यवहार से, उनके कार्य करने की शैली से, हम उनके सिद्धान्तों से परिचित होते हैं, तो लगता मात्र मानव जाति के कल्याण के लिए ही उन्होंने धरा पर चरण रखे हैं | वे परिवार, समाज में रहकर दूसरों की भावनाओं का आदर करते हैं, तो कभी दुःखी, पीड़ितों के विश्वास को अपने स्नेह से सिंचित् करते हैं, तो कभी श्रद्धा-भक्ति से प्रोत्साहित कर पुरुषार्थ के फलों से जीवन को अमृतमय बनाने का प्रयत्न करते हैं |


मानवता : ईश्वर ने मनुष्य को इस पृथ्वी पर भेजा है, मानवीय जीवन जीते हुए दूसरे की सहायता करने के लिए | इसलिए सबसे पहला धर्म मानवता का निर्वाह करना |


राष्ट्रीयता : हम जिस भूमि पर अपना जीवन यापन करते हैं, जो हमें ये सुरक्षा कवच प्रदान करती है, ऐसी भूमि ही हमारा राष्ट्र है | उसके स्वाभिमान की रक्षा के लिए हमें हर क्षण प्रयत्नशील रहना चाहिए |


सेवा : व्यक्ति इस समाज में परिवार में रहता है तो उसे अपने कर्तव्य का निर्वाह अवश्य करना चाहिए | कर्तव्यों को ध्यान में रखकर दूसरों के लिए प्रसन्नतापूर्वक किया जाने वाला कार्य सेवा है | जो अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए होना चाहिए !


समर्पण : समर्पण भावना से हमारा अहंकार नष्ट होता है, तथा हम दूसरों की भावनाओं को समझते हैं | हमारे पास जो कुछ है उससे प्रसन्नता देना ही समर्पण है, जिससे व्यक्तियों के बीच की दूरियां समाप्त होती हैं और निकटता स्थापित होती है |


आचरण : अपने सद्गुणों के अनुसार जीवनयापन करना तथा उसमे वेदान्त संस्कृति का समावेश हो वही आचरण श्रेष्ठ है | सद्गुणी प्रवृत्ति से अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अनुकूल परिस्थितियां निर्मित होती हैं |


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