श्री सदगुरु दत्त धार्मिक एवं पारमार्थिक ट्रस्ट

ध्यान साधना

ध्यान साधना के अलग-अलग प्रकार हमारे यहाँ प्रचलित है | जिसमें नाद ब्रम्ह, सोऽहं, ॐकार निनाद, रत्न योग साधना, रंग साधना, कुंडलिनी साधना जैसे अनन्य प्रकार है | ध्यान योग के लिए सबसे पहले हमें शुद्धि की आवश्यकता है | बाह्य शुद्धि जिसमें हमारे स्नान से लेकर स्थान एवं पर्यावरण शुद्धि भी निहित हैं | आंतरिक शुद्धि में हमारी सूक्ष्म नाड़ियाँ, चक्र, ह्रदय की पवित्रता महत्तव रखती है | ध्यान का सीधा संबंध हमारी पवित्रता से होता है |


पवित्रता के लिए हमें अपने अवगुणों के हटाकर, सदगुणों को बढ़ाना होगा | सदगुणों को आचरण में लाना ही भाव शुद्धि है | जन्म जन्मान्तर के शरीर भोगों से सदगुणों पर अवगुणों की परते बढती जाती है | इसलिए व्यक्ति अवगुणों से प्रभावित होता है, जबकि मनुष्य की ६०० अरब कोशिकाओं में ३ अरब कोशिकाएं गुणों का निर्माण करती है | हम देखते है, प्रकृति सदगुणी है | प्रकृति के अंश होने के नाते हमारे अंदर भी सदगुण विद्यमान है | आज हम देखते है कि एक दूसरे के प्रति द्बेष भाव, स्वार्थ व भय अधिक बाद गया है | अच्छे कार्य करते हुए भी अच्छा विद्यमान, एक अच्छा चिन्तक, एक बुद्धिमान व्यक्ति, तनावों से घिर जाता है | उसकी ऊर्जा निष्तेज हो जाती है | जीवन को अनुकूल बनाने के लिए हमारी ऊर्जा ही हमारा सहयोग करती है | हमारे अन्दर गुण अर्थात् ईश्वर और भाव अर्थात् परमात्मा है | इन दोनों का समन्वय ही ऊर्जा का विस्तार करता है और यह विस्तार ध्यान के माध्यम से संभव है | आज विश्व के देशों ने हमारी प्राचीन पद्दति ध्यान साधना अपनाकर व्यक्ति की सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्थिति में परिवर्तन कर यह साबित कर दिया कि व्यक्ति अपने व्यावहारिक जीवन में योग-साधना का अभ्यास करता है तो उसकी कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है | आज वैज्ञानिक प्रमाण प्राप्त होने के कारण ही साधारण व्यक्ति भी इस और आकर्षक हो रहा है | ध्यान साधना सभी के लिए आवश्यक है |


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