श्री सदगुरु दत्त धार्मिक एवं पारमार्थिक ट्रस्ट

सूर्योदय परिवार

भगवान दत्तात्रेय की सहज भक्ति ही ज्ञान योग है |

यह सारा संसार ब्रह्म है, सारी सृष्टि ही उस ब्रह्म की है | ब्रह्म अपनी इच्छा से इस सृष्टि की रचना करता है और अपनी इच्छा से इसे विलीन कर लेता है | परब्रह्म अपने विविध अवतारों से समय-समय पर धर्म की ध्वजा फहराने के लिए अवतार लेता है | परब्रह्म शक्ति तीन स्वरुपों में हमारे सम्मुख आती है, जिसे हम सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण कहते हैं | हम उसे देवताओं में तीन प्रमुख स्वरुप देते हैं – ब्रह्मा, विष्णु और महेश |


ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन तीन शक्तियों के अतिरिक्त सृष्टि में कुछ है ही नहीं | इन तीनों का एकरूप भगवान् दत्तात्रेय हैं जो योग, भक्ति और ज्ञान स्वरुप हैं | सर्व शक्ति सम्पन्न होने पर भी जिन्हें लेश मात्र अहंकार नहीं, वे भगवान् दत्तात्रेय हैं | लक्ष्मीपति स्वयं विष्णु होने पर भी जिनके हाथों में भिक्षा पात्र है, जो हमें अहंकार का नाश करना सिखाता है | हमें इस अनन्त शक्ति का साथ साक्षात्कार करने हेतु उसी में एकरूप होना है | इस ज्ञान को जब हम समझ लेगें, तब हम भगवान् दत्तात्रेय के गुणों को समझ पाएंगे |


व्यक्ति जब किसी की उपासना करता है, तो उस देवता के सद्गुणों को धारण करने का प्रयत्न करता है | सद्गुणों के माध्यम से देवत्व शक्ति की उपासना हमारे अन्तर के कपाट खोलती है | यदि हम हमारे ईष्ट के प्रति समर्पित नहीं हैं, उसके गुणों को नहीं जानते तो हमारी उपासना व्यर्थ है | भगवान् की पूजा करें और मन अपवित्र है, हमारे अन्तर में पवित्रता नहीं है, अपने अहंकार को, अपनी विषय वासनाओं को हम छोड़ने को तैयार नहीं हैं तो ऐसी उपासना-पूजा व्यर्थ है | भगवान् दत्तात्रेय हमें योग, भक्ति और ज्ञान के आधार पर पवित्र होने का संकेत देते हैं | श्री दत्तात्रेय भगवान् की शरण में जाकर हम अपने आत्म तत्त्व का चिन्तन करें ! आत्म तत्त्व का चिन्तन हमें सेवा, त्याग, समर्पण के मार्ग पर ले जाता है | दत्तात्रेय भगवान् स्वयं परब्रह्म हैं | उनका चिन्तन ज्ञान तत्त्व के माध्यम से कर्म, भक्ति और योग से एकाकार करता है | आज जब सामाजिक धरातल पर, भौतिक धरातल पर हम तनाव का अनुभव करते हैं, तब भगवान् दत्तात्रेय का योग एवं भक्ति हमें शान्ति प्रदान करती है |


भगवान् दत्तात्रेय के इस ज्ञान को समझने के पश्चात हम समझते हैं कि जीवन और प्रकृति एक दूसरे के पूरक हैं | जीवन का अस्तित्व हमारे होने से है | जब तक हम हैं, यह प्रकृति हमारे साथ है | इस प्रकृति की विविध क्रियाओं का शोध करना ही हमारे सत्कार्यों का एक अंग है | दुःख-सुख, लाभ-हानि यह बाह्य जीवन में बने रहते हैं; परन्तु हमारे अस्तित्व का मूल उद्गम आनन्द है | जीवन में हम देखते हैं कि व्यक्ति निरन्तर सुखों की कामना करता है, वह उसका स्वभाव है | दुःख के सामने आते ही वह घबराता है और जीवन से भागने का विचार करता है | इस जीवन से भागकर कहाँ जाएंगे ? भागना धर्म नहीं है | इसलिए भगवान् दत्तात्रेय अपने आत्म तत्त्व की बात करते हैं | आत्म तत्त्व और प्रकृति तत्त्व को एकाकार करने का मार्ग ही योग है | दोनों का मिलन योग है | इस योग से व्यक्ति को आनन्द की प्राप्ति होती है |


दत्तात्रेय भगवान् हमें अपने आत्म चिन्तन की प्रेरणा देते हैं | ज्ञानी, योगी और गुरुओं के गुरु होने पर भी उन्होंने अपने चौबीस गुरु बनाए | चौबीस आर्थात् अपने शरीर के सूक्ष्म चौबीस अंग, जिस पर ध्यान करने व्यक्ति अपनी आन्तरिक ऊर्जा को बढ़ाता है | आज हर व्यक्ति तनाव मंं है, कई व्यक्ति रोग से पीडित हैं, कोई अर्थ की कमी से तो कोई प्रकृति प्रदत्त रोगों से | ऐसे में स्वयं को ऊर्जा से परिपूर्ण करना आवश्यक है | “स्व का विकास और उसके साथ-साथ स्वयं का भी विकास”|


दत्तात्रेय भगवान् कहते हैं, तू मुझमें समर्पित होकर कार्य कर तो योगी हो जाएगा ! कार्य करते समय हम अहंकार में बंध जाते हैं | इस अहंकार का नाश करना ही दत्तात्रेय की भक्ति है, जो योग से सरल सहज प्राप्त होती है | यौगिक क्रियाएं एकान्त में बैठकर आनन्द लेने हेतु नहीं हैं; अपितु अपना कर्तव्य-पालन करते हुए आनन्द के साथ जीवन जीने की प्रक्रिया योग है | दत्तात्रेय भगवान् सम्पूर्ण ब्रह्म, विश्व गुरु, सृष्टि निर्माता हैं; परन्तु वे अहंकार विहीन हैं | एक साथ ही त्यागी और भोगी हैं | इस अभौतिक जगत में उनकी ही भांति, व्यक्ति को विषय भक्ति का भोग करके निर्लिप्त रहना चाहिए |


दत्तात्रेय भगवान कहते है, तू मुझमे समर्पित होकर कार्य कर तो योगी हो जायेगा | कार्य करते समय हम अहंकार में बंध जाते है | इस अहंकार का नाश करना ही दत्तात्रेय की भक्ति है जो योग से सरल सहज प्राप्त होती है | यौगिक क्रियाएं एकांत में बैठकर आनंद लेने की नहीं है, बल्कि अपना कर्तव्य करते हुए आनंद के साथ जीवन जीने की प्रक्रिया योग है | दत्तात्रेय भगवान सम्पूर्ण ब्रम्हा, विश्व गुरु, सृष्टि निर्माता है | परन्तु वे अहंकार विहीन है | एक सही साथ त्यागी और भोगी है | इस अभौतिक जगत में उनकी ही तरह व्यक्ति को विषय भक्ति का भोग करके निर्लिप्त रहना चाहिए |


कर्म योग सहज साधारण है | मनुष्य का जीवन तो कर्म से जुड़ा है | शिक्षित हो या अशिक्षित कर्म तो करना ही होता है | अपने कार्य करने की समस्त शक्ति को उस महाशक्ति के चरणों में समर्पित कर दो ! सर्वशक्तिमान भगवान् दत्तात्रेय यह जानते हैं कि हमारे पास कौन सी शक्ति मानव कल्याण की है और कौन सी भावना स्व-कल्याण की है ? योग से व्यक्ति की दिव्य चेतना विकसित होती है | इस चेतना को हमें मानव कल्याण में लगाना होगा, तभी इस कलयुग में हम सतयुग का अनुभव कर पाएंगे | कलयुग में होना अथवा सतयुग में होना, हमारे अन्तर के भावों पर निर्भर करता है | हम अपने सत्कार्यों के माध्यम से, पुरुषार्थ के माध्यम से सन्तुष्टि प्राप्त करते हैं तो यह सतयुग है | और यदि अपने कार्यों से असन्तुष्टि प्राप्त करते हैं तो यह कलयुग है | भगवान् दत्तात्रेय की आराधना कर हम पुरूषार्थ और सत्कर्मों से सन्तुष्टि प्राप्त करें, जिससे आनन्द और शान्ति का मार्ग प्रशस्त होगा |


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