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नाथ संप्रदाय
श्री सदगुरु दत्त धार्मिक एवं पारमार्थिक ट्रस्ट

सूर्योदय परिवार

नाथ संप्रदाय में निरंजन परमेश्वर की उपासना

भारत वर्ष में अनेकानेक सम्प्रदाय और अध्यात्म के दर्शन पर विभिन्न मत हैं | आध्यात्मिक मार्ग पर हर कोई जाना चाहता है, कोई भक्ति मार्ग से, कोई कर्म योग के द्वारा, तो कोई योग साधना से | व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति के लिए व्याकुल रहता है और अनेक विचारों में जो उसे रुचिकर लगता है, उस मार्ग पर चल पड़ता है | नाथ सम्प्रदाय में आत्मशुद्धि की परम्परा है | व्यक्ति अपने भावों को, विचारों को शुद्ध करके परमात्मा को अपने हृदय में स्थापित करे और मानव जाति का कल्याण करते हुए जीवन-यापन करे ! यही इस सम्प्रदाय की विशेषता है | नाथ सम्प्रदाय के सम्बन्ध में जनमानस में अत्यन्त जिज्ञासा है |


योग साधना में भी नाथ सम्प्रदाय का विशेष महत्त्व है | नाथ योग विद्या को शिव विद्या अथवा महा योग विद्या कहते हैं | इस साधना का आधार पिण्ड और ब्रह्माण्ड के सम स्तर पर अन्तर्ब्रह्म साक्षात्कार है | इस सम्बन्ध में स्वयं शिवजी ने पार्वतीजी से कहा है कि योग मार्ग में अद्वैत से परे परम शिव ही ‘नाथ देवता’ है | निराकार, निर्विकार, निर्मल ज्योति का प्रतीक यह योग साधना में प्राप्त होता है | तत्त्वतः ‘परम शिव’ ही इस योग साधना का उद्देश्य होता है | जिनके सान्निध्य में साधना करते हुए योग साधना अपने सच्चिदानन्द स्वरुप में आनन्दित हो उठती है |


नाथ सम्प्रदाय में योग साधना से अमृत तत्त्व की प्राप्ति और मृत्यु विजय रूप फलसिद्धि को ही योग पुरुषार्थ कहा गया है | इस योग मार्ग में काया ही योग साधना का महान् क्षेत्र है | अमर काया ही सर्वश्रेष्ठ योग सिद्धि है | अपने ईष्ट देव का ध्यान ही ग्रन्थ है | शरीर ही सर्वश्रेष्ठ रत्न है | सत्य ही सर्वश्रेष्ठ शास्त्र है | नाथ सम्प्रदाय में परमेश्वर की उपासना की जाती है | योगी गौरक्षनाथ जी ने निरंजन परमेश्वर के बारे में कहा है कि “उदै न अस्त रात न दिन, सरबे चराचर भाव न भिन्न | सोई निरंजन डाल न मूल, सर्व व्यापीक सुषमन असथूल ||


इस योग साधना का मूल स्रोत क्षीरसागर के तट पर, सप्तश्रृंग पर महा योगी शिव द्वारा पार्वतीजी को प्रदत्त ज्ञान है, जिसका श्रवण योगी मस्त्येन्द्र नाथजी (मच्छेन्दर नाथजी) ने किया था | इस ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने अपने शिष्य योगी गौरक्षनाथ को चुना, उन्हें सत्पात्र स्वीकार किया | उसके पश्चात् नाथ सम्प्रदाय में नाथ सिद्धयोगी चौरंगीनाध, योगी भर्तृहरिनाथ, योगी गहनिनाथ, योगी सत्यनाथ, योगी जालंधरनाथ, योगी कृष्णपाद, योगी गोपीचन्द आदि भी सम्मिलित हुए, जिनकी योग समृद्धि एवं विश्व कल्याण की भावना से नाथ सम्प्रदाय को पोषण प्राप्त हुआ |


यह साधना योग दर्शन, शिव विद्या अथवा प्राण साधना की सतत् सनातन प्रक्रिया है | यह अनादि, अखण्ड और त्रिकाल व्यापी है | यह मार्ग सर्व सिद्धियों को प्राप्त कराने वाला तथा मायाजाल को समाप्त करने वाला है | इस योग साधना के मार्ग से साधक को ज्ञान प्राप्त होता है और वह अविद्या के अंधकार से मुक्त होता है | महायोगी गौरक्षनाथ ने मुक्ति मार्ग के लिए नाथ सम्प्रदाय की अद्वितीय साधना पद्धति लोक कल्याण हेतु रखी है | इस मार्ग का साधक प्रायः सभी सामान्य दशाओं में भिन्न (अलिप्त) और अत्यन्त शान्त रहता है | योग की दृष्टि प्राप्त होने पर वह स्वयं को विराट स्वरुप में अनुभव करता है | वह विभिन्न स्वरूपों में दिखाई देने वाले परमात्मा को और उसकी कृति को अपने भीतर अनुभव करता है, अपने हृदय में देखता है | इस प्रकार वह समस्त ब्रह्माण्ड का दर्शन कर आनन्द प्राप्त करता है | वह सब में एकात्म भाव रखकर सभी को परमात्म साधना में गुरुकृपा का अधिक महत्त्व है | निरंजन पद प्राप्त करने के लिए गुरु कृपा दृष्टि एवं अमोघ साधन है | (वह एकात्म भाव रखकर सभी में परमात्मा को देखता है | परमात्म साधना में गुरुकृपा का अत्यधिक महत्त्व है तथा निरंजन पद प्राप्ति हेतु गुरु की कृपा दृष्टि एक अमोघ साधन है |)


नम: शिवाय गुरवे नाद्बिन्दुक्लात्माने | निरंजन पद याति नित्य यत्र परायण: ||


महायोगी गौरक्षनाथ ने गुरु को स्वानन्द विग्रह कहा है | सदगुरु की करुणा के बिना योग साधक, सांसारिक विषयों से छुटकारा नहीं पा सकता और न उसे तत्त्व का दर्शन ही हो सकता है | उसे सहज अवस्था में स्वरुप स्थिति भी दुर्लभ हो जाती है | गुरु की कृपा से ही निरंजन पद की प्राप्ति होती है | नाथ साधना में ‘समाधि’ परम फल है | इसके द्वारा साधक के समस्त द्वंद्वों का अन्त हो वह एकात्म भाव में स्थित हो जाता है | इसका दूसरा नाम ‘हठ योग’ है | जब तक योगी की निष्ठा सम्पूर्ण परमात्मा को प्राप्त नहीं होती, तब तक उसके जन्म-मरण का दुःख यथावत् रहता है | इसलिए पहले अपनी निष्ठा को परमेश्वर के चरणों में, गुरु के चरणों में रखकर तत्पश्चात् नाथ सम्प्रदाय की साधना पद्धति को आत्मसात् करने से ‘परम योगी’ का पद प्राप्त होता है, यही नाथ सम्प्रदाय की योग साधना है |


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